Thursday, March 26, 2009

जोर का झटका धीरे से लगे

दुनिया भर को फ्राईड चिकन खिलाने वाली कंपनी केएफसी अब लुईविल शहर में अब सड़कों पर गड्डे भरकर उस पर अपने नाम का पोस्टर लगाने जा रही है। हर थिगड़े पर लिखा होगा "रिफ्रेशड बाई केएफसी"!

कंपनी ने इस "रिफ्रेश" प्रोग्राम के लिये अमेरिका के शहरों के मेयरों को अपने-अपने शहर को नामिनेट करने को कहा है। लाटरी के द्वारा चयन करके चार शहरों के गड्डों को इस प्रोग्राम के तहत "रिफ्रेश" किया जायेगा।

ऐसा कोई आईडिया अपने देश के बड़े दुकानदारों के दिमाग चढ़ गया तो विवाद ही विवाद और मौज ही मौज! उदाहरण के लिये -

  • महात्मा गांधी मार्ग के फलाने गड्डे के प्रायोजक है किंगफिशर वाले मलाया जी
  • आईबीपी वाले कहेंगे - "प्योर भी, पूरा भी" की जगह "प्योर भी, पूरा भी, भरा भी"
  • Nike का "Just do it" हो जायेगा "Just did it"
  • Crest वाले "Look, Ma, no cavities" की जगह कहेंगे ""Look, Mayor, no cavities"
  • पेप्सी वाले कहेंगे गड्डों को देख कर कहेंगे - "ये दिल मांगे मोर"
  • फोर्ड वाले गड्डा भर कर कहेंगे "Built for the Road Ahead"
  • विप्रो को "Applying Thoughts" की जगह कहना पड़ेगा "Applying Patches"
  • नेस्कैफे कहेगा "Open up" की जगह "Fill up" - Nescafe
  • ताज ग्रुप के टाटा साब कहेंगे "Nobody cares as much"
  • और राजेन्द्र मार्ग के इस गड्डे को भरा है मिरांडा ने ताकि "जोर का झटका धीरे से लगे"
वाह मार्केटिंग!

12 टिप्पणियां:

ताऊ रामपुरिया 3/27/2009 12:09:00 AM  

बहुत स्मार्ट आईडिया है जी.

रामराम.

राज भाटिय़ा 3/27/2009 12:38:00 PM  

बहुत ही सुंदर,
धन्यवाद

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi 4/07/2009 12:04:00 PM  

क्‍या मार्केटिंग आयडिया है। भारत में अधिक तेजी से विकसित होगा।

रचना. 4/13/2009 09:53:00 PM  

अहा!! मजेदार!
मोबाइल वालों को क्यूं छोड दिया!
उनकी पंच लाइन्स कुछ इस तरह बन जाती-

" लो भर लो गड्ढा! " ( लो कर लो बात)

" connecting roads!" ( connecting india ) ....

नितिन व्यास 4/13/2009 10:25:00 PM  

सबका धन्यवाद! रचना जी " लो भर लो गड्ढा! " अच्छा लगा।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन 4/16/2009 11:18:00 PM  

वाह भई वाह!

प्रकाश गोविन्द 5/02/2009 08:41:00 AM  

Bahut Khoob.

mark rai 5/03/2009 04:32:00 AM  

बहुत ही सुंदर,
धन्यवाद........


अन्दर तो छोडिये साब ...छत पर लेट कर भी कोई समाधान नही खोज पता । इसे जड़ता नही कहा जाए तो और क्या ?हालत तो ऐसी है की जब अपनी ही पीडाओं का पता नही तो दूसरों ......!
अभी भी रोटी के संघर्ष को नही जान पाया । कैसे माफ़ किया जाय मुझे ......
घर और मुल्क की गरीबी का कोई प्रभाव नही पड़ा । कैसे माफ़ किया जाय मुझे ......

भूतनाथ 5/03/2009 11:05:00 PM  

वो तो सब कुच्छ ठीक है भाई.....आपकी बात हमारी भी समझ में आई.....मगर अपना ये क्या हाल बना रखा है आपने....??हाथी-हाथी से नज़र आते हो......!!हाथी पर चढ़े हुए होने तक तो गनीमत थी.....हाथी ही हो जाना....ये ज्यादती है....बेशक किसी ने कहा भी हो कि तेरे प्यार में मैं खो जाउंगा....तेरी शक्ल का मैं हो जाउंगा...!!

sachin vyas 5/10/2009 04:00:00 AM  

bahut accha.
reliance wale kahenge:-bhar diya gaddh mitti se.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` 5/13/2009 01:25:00 PM  

It is all in a day's work in marketing !

योगेन्द्र मौदगिल 5/22/2009 02:05:00 AM  

लाजि़कल बात है प्यारे वाह....

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