Sunday, September 28, 2008

रंग-ए-खुदा (The Color of Paradise)




रंग-ए-खुदा का बाल नायक मोहम्मद एक आठ-नौ वर्षीय नेत्रहीन बालक है। नेत्रहीन बालक अपनी कमजोरियों के बावजूद स्पर्श और सुनने की क्षमता से खुदा के उन रंगो को देख सकता है जो सामान्य लोग नहीं समझ सकते।

मोहम्मद का विधुर पिता उसे तेहरान के नेत्रहीनों के स्कूल से उत्तरी ईरान में अपने गांव छुट्टियों में ले जाता है। गांव में दादी और दो बहनें, मोहम्मद को मिल कर बहुत खुश होते है। दादी गांव के स्कूल के मास्टर से मिल कर मोहम्मद को एक दिन के लिये कक्षा में जाने देती है, पिता दुबारा शादी करना चाहता है उसे लगता है कि एक नेत्रहीन बालक उसके लिये सामाजिक शर्मिंदगी का कारण है। वह जबरदस्ती मोहम्मद को दूर के गांव में एक नेत्रहीन बढई के पास काम सीखने के लिये भेज देता है। इस फैसले से दादी खफा हो जाती है। मोहम्मद के पिता के मानसिक संघर्ष, आशाहीनता और अस्तित्व की लडाई की कहानी देखने लायक है, पिता का खुदा के रंगो को बच्चे के नजरिये से देखने का प्रयास रंग लाता है और वह प्रकृति के रचियता के सामने खुद को समर्पित कर मोहम्मद को वापस ले आता है।

पूरी तरह से काव्यात्मक तरीके से बनाई गई इस फिल्म में ईरान के उत्तरी भाग की प्राकृतिक सुन्दरता को बेहतरीन तरीके से दिखाया गया है। पक्षीयों की आवाज और मोहम्मद की प्रतिक्रिया सुनने और देखने का आनंद बयान नहीं किया जा सकता!

बच्चों के माध्यम से सामाजिक आईने को दिखाने की मजीद भाई की एक और शानदार प्रस्तुति!

जरुर देखें

Thursday, August 14, 2008

बचेहा-ये-आसेमान (Children of Heaven)


ईरान के मजीद मजीदी की लिखी और निर्देशित भाई - बहन के रिश्ते पर आधारित ये १९९७ की फिल्म आस्कर पुरुस्कारों के लिये नामांकित की गई थी।
अली (आमिर फारुख हशमियां) अपनी बहन जहारा (बहारे सिद्दीकी) के एकमात्र जोडी फटे जूते सिलवा के लाते समय बाजार में खो देता है। मजदूर पिता और बीमार मां के हालात को ध्यान में रख कर और पिटाई होने डर से दोनों बच्चे ये बात मां-बाप को नहीं बताते हैं। अली और जहारा, अली के फटे हुए जूतों को बारी-बारी से पहन कर स्कूल जाते हैं लेकिन अली पूरे समय जूते खो देने के दुख में इस प्रयास में है कि बहन के लिये जूते कैसे लाये जायें।
बच्चों की भावनाओं, ईरान के सामाजिक वातावरण और भाई-बहन के प्यार को बहुत ही सुन्दर तरीके मजीदी ने फिल्मांकित किया है। फिल्म के अंत में अली का जूतों के लिये दौड में भाग लेना और उसे जीतने (?) का प्रयास बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देता है।

Saturday, August 09, 2008

दुविधा










बोस्टन के बच्चों के संग्रहालय के बाहर का दृश्य, क्या ऐसा नहीं लगता कि ये जनाब इस दुविधा में हैं कि इस कांक्रीट के जंगल में उडूं या नहीं?

Monday, April 28, 2008

हिन्दी ब्लॉगर प्रश्नावली - उत्तर पुस्तिका

जीतू भाई की हिन्दी ब्लॉगर प्रश्नावली पर मेरे कुछ जवाब -

क्या आपका अपना हिन्दी ब्लॉग है?
- है, इस वक्त आप इसी गरीबखाने पर हैं।

आप रोजाना कितने हिन्दी ब्लॉग पढते है?
दस से बीस तक (नाम फुरसतिया ना हुआ तो क्या फुरसत पर तो अधिकार है मेरा भी!)

आपकी ब्लॉगिंग की प्रेरणा किससे मिली?
आप ही तो है, रोगी बनाके रख दिया है, बाहर मिलो तो निबटते है।
ये तो १०००००००% फीसदी सच है, मानो या ना मानो, सबूत में ये देख लो!

आप हफ़्ते मे कितनी पोस्ट लिखते है?
एक से भी कम , सच्चाई तो ये है कि जनम से ही आलसी हूं!

आप ब्लॉगिंग क्यों करते है?
सुना है ब्लॉगिंग करने से लोग भोंदि*बुद्दिजीवी बन जाते है,इसलिए ट्राई मारा।
*भोंदि - भौंदूओं के पाये जानी वाली वैसी ही वस्तु जो बुद्दिजीवीयों के पास बुद्दी के रुप में होती है


आप अपने ब्लॉग पर क्या लिखना पसंद करते है?
दूसरों का पका पकाया विचार "इंसपायर" हो कर अपनी नाक कलम से गाना लिखना!

आप अपने ब्लॉग पर कितने बड़े लेख लिखते है?
एक पैराग्राफ़ वाले (अब १०० किलो के शरीर में एक पाव का दिमाग है जो १ पैरा लिखने में ही थक जाता है)
आप दिन भर मे कितनी टिप्पणियां करते है?
पाँच से दस टिप्पणियां (प्रेम व्यवहार बनाके रखना पड़ता है, कभी तो लोग उधार चुकाएंगे)
ये बात अलग है कि उधार प्रेम की कैंची है।

हिन्दी चिट्ठाकारों के आपसी विवादो पर आपका क्या सोचना है?
सब टीआरपी का खेल है बाबा - बिना टीआरपी बढाये कोई पुरुस्कार मिलता है क्या!

आपके ब्लॉग पर की गयी टिप्पणी आपको कितनी अच्छी लगती है।
- नए ब्लॉगर की टिप्पणी हमेशा, आशा बंधाती है (पुराने गए तो क्या हुआ, एक नया ग्राहक और बढा)

आप ब्लॉगिंग से कितनी कमाई कर लेते है।
-क्यों बताऊं IRS से छापा पडवाओगे क्या?
वैसे बडों ने समझाया था कि महिलाओं से उमर और पुरुषों से कमाई पूछना अच्छी बात नहीं है।


अब इतने जवाब दे दिये, नंबर का हिसाब भी मैं ही लगाऊं ये तो ठीक नहीं, जीतू भाई कितने नंबर दोगे मुझे?




Saturday, April 26, 2008

तितलियां

विकिपीडिया के अनुसार दुनिया भर में तितलियों के बहुत सारे पार्क हैं इनमें से एक मैजिक विंग्स मेरे घर से कुछ ही दूरी पर है। मेरी वर्षीया बेटी को यह जगह बहुत पसंद है, इसी पार्क में खींची मेरी कुछ तस्वीरें


























Monday, February 11, 2008

शिल्पा शेट्टी फिर जीत गई

आज के इंडियन एक्सप्रेस में मेरे पसंदीदा लेखक अरुण शौरी जी ने अरुणाचल प्रदेश में बढते हुये चीनी अतिक्रमण पर एक विचारोत्तेजक लेख लिखा है,

अब देखना ये होगा कि क्या मीडिया के साथी इसे मुद्दा बनाने का प्रयास करेंगे या फिर संजय दत्त के नये हनीमून को?

Friday, December 14, 2007

खेल, ज्ञान और दान

आज पब्लिक रेडियो के तकनीकी पोडकास्ट पर मुफ्त चावल के बारे में सुना । Freerice.com के दो मुख्य उद्देश्य हैं -

१. मुफ्त अंग्रेजी शब्द संग्रह उपलब्ध कराना।
२. भूख पीड़ित लोगों को चावल उपलब्ध कराना।

यहां पर आप अंग्रेजी शब्द संग्रह को खेल - खेल में बढा सकते है, हर शब्द का सही अर्थ बताने पर २० चावल के दाने आवंटित हो जाते है, जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ के विश्व खाद्य कार्यक्रम के तहत जरुरतमंदों तक पहुंचाया जाता है।

चावल का खर्चा इस साइट पर आने वाले विज्ञापनों के जरिये वहन किया जाता है.

क्यों ना ऐसा खेल हिन्दी भाषा का ज्ञान बढाने के लिये और अपने देश के जरुरतमंदो के लिये भी बनाया जाये?


Sunday, November 11, 2007

उपभोक्तावाद और प्रदूषण

उपभोक्तावाद पर संशयात्मा पर बहुत अच्छा लेख लिखा गया है। मार्केट प्लेस और पब्लिक रेडियो ने उपभोक्तावाद पर एक बहुत अच्छी श्रंखला प्रसारित की है, इसे यहां पढा जा सकता है।

साथ ही टैस विगलेन्ड के कूडे पर चलाये गये अभियान को जरुर पढे ।

Saturday, October 06, 2007

माँ

माँ का रिश्ता दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता है, इस रिश्ते पर कई गीत लिखे गये है् कुछ मेरे पसंदीदा गीत -

सचिन दा का गाया ये गीत



मलकीत सिंह का गाया ये गीत विदेश में रहने वालों को रुला देता है


और जगजीत जी के अलबम Cry for Cry से सिजा राय का गाया ये

माँ सुनाओ मुझे वो कहानी
जिस में राजा ना हो ना हो रानी

जो हमारी तुम्हारी कथा हो
जो सभी के ह्रदय की व्यथा हो

गंध जिस में भरी हो धरा की
बात जिस में ना हो अप्सरा की
हो ना परियां जहां आसमानी

वो कहानी जो हंसना सिखा दे
पेट की भूख को जो भुला दे

जिस में सच की भरी चांदनी को
जिस में उम्मीद की रोशनी हो
जिस में ना हो कहानी पुरानी!

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सागरभाई ने इस पोस्ट पर माँ को समर्पित एक और बेहतरीन गीत सुनवाया, धन्यवाद सागर भाई!!

Saturday, August 11, 2007

संगठन में शक्ति

पुराणिक समय से लोग संगठन में शक्ति के बारे में कहते आये हैं, हमने भी स्वतंत्रता इसी मूल मंत्र के पालन के फलस्वरूप मिली,, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि हम इसे भूलते जा रहे हैं?

बाहरी और अंदरूनी आतंकवाद से निपटने के लिये पुन: सारे मतभेद मिटा कर एक होना होगा, ये देखिये जब जानवर ये कर सकते है तो हम क्यों नहीं?




(फाईल बडी है, धीरे धीरे लोड हो सकती है)

Saturday, April 07, 2007

इटली (भारत?) और यूरोप

कल एक मित्र ने इमेल में ये लिंक भेजी, इटली के संदर्भ में ये कितना सच है ये तो इटलीवासी मिश्र जी या सुनील जी बता सकते है, लेकिन क्या भारत में यह सच नहीं है?

जो भी हो फिल्म बढिया है।

Thursday, March 01, 2007

गूगल का हिन्दी प्रेम

जीतेन्द्र भाई ने बताया कि गूगल बाबा हिन्दी का पोर्टल ला रहे हैं, लेकिन गूगल का हिन्दी प्रेम सिर्फ पैसा कमाने के लिये नहीं है, गूगल देश में साक्षरता के प्रचार प्रसार में भी योगदान दे रहा है। मुझे ये जानकारी तब मिली जब टेक्स केलकुलेटर की तलाश करते समय मैने ब्राउजर में गलती से google.com की जगह google.org लिख दिया। गूगल और प्लेनेट रीड ने कम साक्षर लोगों को पढने के नियमित अवसर प्रदान करने के लिये बालीवुड की फिल्मों के उपशीर्षक हिन्दी में ही दिखाने के अनुपम विचार को माध्यम बनाया है। प्लेनेट रीड का एक और प्रयास है देसी लस्सी, जहां आप हिन्दी फिल्मी गीत देख, सुन और पढ भी सकते हैं।

हो सकता है अब रमण भाई और रविजी कहें काश गूगल के प्रोग्रामरों ने हिन्दी वर्तनी के लिये यहीं देख लिया होता

Saturday, February 24, 2007

डिजाईनरों की दुविधा

वैक्लपिक उर्जा के प्रयोग को बढाने के लिये विभिन्न कार बनाने वाली कंपनियां नये नये माडल बाजार में ला रही हैं। इनमें से एक है Toyota Prius जो कि अमेरिका मे सर्वाधिक बेचे जाने वाली हाईब्रिड कार है लेकिन अब टोयोटा के डिजाईनरों की नई उलझन है कार की आवाज!!

नेत्रहीनों के नेशनल फेडरेशन के मुताबिक नेत्रहीन बैटरी से चलने वाली कारों की आवाज बिलकुल ना होने के कारण सुन नहीं सकते है। इसके मुताबिक बिलकुल कम आवाज वाली हाईब्रिड कारें नेत्रहीनों के लिये खतरा हो सकती हैं जो कि रास्ता पार करते समय अपनी श्रवण इन्द्रि का प्रयोग करते हैं। एक तरफ कम आवाज की समस्या तो दूसरी तरफ आवाज के प्रदूषण को कम करने की समस्या, देखते हैं टोयोटा के डिजाइनर क्या फैसला करते है!

ये खबर मैनें यहां सुनी

खेल खेल में

हिन्दी चिठ्ठा जगत में खेल खेल में चालू हुई ५ सवालों की बौछारें सारे चिठ्ठकारों को लिखने पर मजबूर कर रही है। इस का श्रेय जाता है अमित को, वे खुद तो फंसे ही, पूरे हिन्दी चिठ्ठा जगत को लपेट ले गये-- खैर जो हुआ सो अच्छा, कम से कम मेरे लिये तो बहुत अच्छा । बहुत दिनों से विभिन्न कारणो के चलते सिर्फ पढ रहा था, अब उन्मुक्त जी ने ५ सवालों की कडी मुझे दे दी है तो लिखना तो पडेगा ही तो ये रहे मेरे जवाब कुछ बदले हुए क्रम में ...

यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे?

वैसे तो भगवान इतना बडा वरदान किसी को देंगे मुझे संदेह है और मान लिजीये भगवान ने निश्चय कर ही लिया है कि ऐसा वरदान किसी को देना है तो भी मुझे देंगे कि मै कुछ बदल सकूं, मै तो कल्पना भी नहीं कर सकता । शायद मेरा नंबर तो तभी आयेगा जब कोई अर्जुन भगवान के मंत्री मंडल में हो, और मुझे किसी ना किसी श्रेणी में समझते हों। खैर यदि भगवान ने वरदान दे ही दिया तो मैं रोकना चाहूंगा सामान्य जीवन में बढ रही अनुशासनहीनता को, यदि हम सब अनुशासित हो जायें और देश के कानून का सही तरीके पालन करें तो बहुत जल्द ही वापस भारत को एक अग्रणी राष्ट्र बना सकते है। एक छोटा सा उदाहरण यातायात के नियमों के पालन में अनुशासन का हो सकता है, हम में से कितने लोग है सुनसान बिना बत्ती वाले चौराहे पर जहां सिर्फ रुको-देखो-जाओ लिखा हो, रुकते हैं शायद बहुत कम । ना रुकने के कारण है हमारी अनुशासनहीनता , आप यह भी कह सकते हैं कि ना रुकने का कारण इस चिन्ह का ना दिखाई देना भी हो सकता है, क्योंकि उस पर किसी बाबा के शहर में पधारने का नोटिस चिपकाया गया हो और यातायात में रुकने से ज्यादा जरुरी उनके सत्संग के शिविर की जानकारी मिलना हो!
मैंने अपने अल्प प्रवास में यहां अमरीका में देखा है कि सामान्य नागरिक आम जीवन में अनुशासित है, कम से कम सरकारी कानूनों का तो पालन मुस्तैदी से करते हैं, काश हमारे देश में भी...

तो फिर यदि भगवान को वरदान देना ही हो तो हम सब को सदबुद्धी, सुसंस्कार आदि, आदि दें !

आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?
मैं लगभग सभी तरह के चिठ्ठे पढता हूं, अतुकांत कविताओं के पन्नों को छोड कर । मुझे खासकर
उन्मुक्त , जो न कह सके , छायाचित्रकार, फुरसतिया, मेरा पन्ना, मंतव्य, जोगलिखी, उडन तश्तरी, रवि रतलामी और ईस्वामी पसंद है । हर एक को पसंद करने के कारण अलग-अलग हैं, वे क्या है ये फिर कभी।।।

आपकी अपनी सबसे प्रिय चिट्ठी कौन सी है?
मैनें कहने को चिठ्ठा लेखन का एक साल पूरा कर लिया लेकिन लिखा सिर्फ १५ बार, शायद वही अनुशासन की कमी जो ऊपर लिखी है, खैर मैनें लिखा कम तो क्या? पढा तो बहुत, शायद सारे लेख जो पिछले एक साल में नारद पर अवतरित हुऐ । मेरी लिखी हुई गिनी चुनी चिठ्ठीयों में से मुझे अमेरिकन देसी पसंद है।

आपकी सबसे प्रिय पुस्तक और पिक्चर कौन सी है?
गुस्ताखी माफ मैं किसी एक का नाम ना ले पाऊंगा । मुझे non-fiction किताबें ज्यादा पसंद है, कुछ पसंदीदा किताबें Freedom at Midnight , Men Are from Mars, Women Are from Venus ,Made in Japan, गोदान और रागदरबारी हैं। भारत में रहते वक्त मैं वागर्थ और हंस नियमित रूप से पढता था इन के कारण ही मेरी रुचि हिन्दी साहित्य की ओर बढी। फिल्मों में मुझे एक डाक्टर की मौत, पुष्पक और The Pursuit of Happyness मुझे पसंद है। The Pursuit of Happyness मैनें यहां पढने के बाद देखी, मुझे अंग्रेजी फिल्में कम पसंद आती थी लेकिन इसको देखने के बाद से मुझे अंग्रेजी फिल्मों को देखने का शौक लग गया है और शौक भी ऐसा की पिछले १ महीने में मैने Schindler's List , You've Got Mail , Amélie , Philadelphia देख डाली।

क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?

हिन्दी चिठ्ठा संसार ने मुझे लोगों की मानसिकता समझने का मौका दिया है। इस मित्र जगत में सभी हैं वैग्यानिक , कानूनविद , इंजीनियर, ग्रहणीया , अकाउटेंट, विधार्थी, कवि, लेखक, पत्रकार, व्यवसायी और फुरसतिये सबकी अलग विचारधारा, जीवन शैली और लेखन । यहां पर लिखने और पढने से मेरे विचार भी बदले हैं और आम जीवन में होने वाली घटनाओं का विश्लेषण करने का तरीका भी । उदाहरण के तौर पर मेरी लिखी ४=‍‍‍ ५ वाली ईमेल और उसका इतना गंभीर मतलब! शायद मैं ऐसा कभी ना सोच पाता ।


रवि जी की तरह ही मैं भी इस खेल की कमजोर कडी हूं इसलिये किसी और को न फासूंगा।। जिन्हें जुड चुके या जोड दिये जायेंगे ।

उन्मुक्त जी क्या आपको सारे जवाब मिल गये?

Sunday, November 12, 2006

ये कैसी रही

कद्दू महोत्सव के दौरान यहां लाइब्रेरी में बच्चों के लिये कई कार्यक्रम होते हैं, उसी में मेरी बिटिया ने एक कद्दू रंगा था, जिसे बालकनी में रख कर सुखाया जा रहा था । लेकिन कद्दू पर तो इनकी नजर लगी थी..



और भर पेट भोजन के बाद मेडम यहां शायद ये गा रही हैं


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Tuesday, October 17, 2006

नया की-बोर्ड

आज दिहाडी काट के लौटते समय मार्केट प्लेस फिर से सुना, जो कि हमेशा सुनता हूं। आज की खास खबर थी - ग्रामीण भारत में उपभोक्ताऒं को बढ़ाने के लिये HP की कोशिश के बारे में..
इसके मुताबिक हिन्दी के सारे अक्षरों को टाइप करने के लिये १५०० कुंजीयों की जरुरत होगी, क्या यह सही है?
लेकिन सही खास बात तो थी HP के जेश्चर आधारित की-बोर्ड की..

अच्छा प्रयास है HP का!

Wednesday, October 11, 2006

बादाम की चोरी

अपने देश में तो गेंहू, चावल के ट्रक गायब होना आम बात है। हर साल हजारों टन अनाज सरकारी खजाने से चोरी होता है और खुले बाजार में बिकता है लेकिन बड़ा देश अमेरिका तो चोरी भी बड़ी... मतलब गेंहू, चावल की ना हो कर बादाम की!

ख़बर यहां पढ़ें

Sunday, October 01, 2006

शरद ऋतु !

नवरात्र, दशहरा और रमज़ान - त्यौहारों का मौसम है भारत में, यहां अमेरिका में हेलोवीन की तैयारी चल रही है, साथ ही उत्तर-पूर्व अमेरिका में पतझड़ की..

पतझड़ी पेड़ो पर पत्तियों के रंग बदलने लगे है.. कुछ चित्र..




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Saturday, July 15, 2006

वाह रे मिडीया!!

मुंबई धमाकों की खबरें तो मैनें यहां अमेरिका में जाल पर ही देखी-पढ़ी लेकिन सौभिक चक्रबर्ती के इस लेख ने बता दिया कि भारतीय टीवी चैनलों ने कितनी फालतू बडबड की होगी!

Saturday, May 20, 2006

क्या हम सुधरेंगे?

पहले मूर्तियों का दूध पीना, मछली चिकित्सा के लिये कतार लगाना, फिर
एक ज्योतिषी का खुद की मृत्यु की घोषणा करना और तमाम लोगों का उस खबर का सीधा प्रसारण देखना..
और अब 'एक चम्मच चमत्कारी पानी'...

क्या हम सुधरेंगे?

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